भारतीय सेना (Indian Army) के वो महावीर जिन्होंने मौत को भी मात दे दी, जिनकी वीर गाथा सुनकर आज भी लोगो मे जोश भर जाता है, इस वीडियो में आपको उन्ही महावीर अमर बलिदानी मेजर आशाराम त्यागी (Major Asharam Tyagi) की गौरव गाथा सुनाएंगे।
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उत्तर प्रदेश के ज़िला गाजियाबाद (Ghaziabad) में मोदीनगर (Modinagar) तहसील के गांव वीर फतेहपुर (Veer Fatehpur Taga) के एक समृद्ध जमींदार किसान चौधरी सगवा सिंह त्यागी (Chaudhary Sagwa Singh Tyagi) एवं माता बसंती देवी के यहाँ 2 जनवरी 1939 को मेजर आसाराम त्यागी (Major Asharam Tyagi) का जन्म हुआ। बचपन से ही वह बहुत चुस्त-दुरुस्त, तेजतर्रार , बहादुर व फुर्तीले थे, जिसे देखकर लोग उनके पिता से कहते थे कि सागुवा, एकदिन तुम्हारा ये बेटा बड़ा होकर, तुम्हारा व तुम्हारे परिवार का नाम पूरे देश में रोशन करेगा! यह सुनकर उनके पिता मुस्कुराते हुए लोगों का अभिवादन कर देते थे, लेकिन उन्हें बिल्कुल भी इस बात का आभास नहीं था कि एक दिन सच में अपनी वीरता के दम पर उनका बेटा आसाराम देश ही नहीं पूरी दुनिया में उनका नाम हमेशा के लिए अजर-अमर कर देगा।
धीरे-धीरे समय बीतता गया और आसाराम बड़े हो गये, इसी बीच उनके मन में सेना (Army) का हिस्सा बनाने का विचार आया। क्योंकि अब उनके दिल और दिमाग में सिर्फ सेना की ही लक्ष्य था, इसलिए आसाराम ने सेना में जाने के लिए जबरदस्त मेहनत के साथ तैयारियां शुरू की और भारतीय सेना को अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लिया। अपनी कड़ी मेहनत, योग्यता और हुनर के बदोलत 27 मार्च 1959 में उन्हें सीधे लेफ्टिनेंट (Lieutenant) के पद पर चयनित किया गया। बाद में 1963 में उन्हें कैप्टन (Captain) और 1965 के शुरू में मेजर (Major) बनाया गया।
1962 के भारत चीन युद्ध (Indo China War) मे उन्होंने दुश्मनो से डटकर मुकाबला किया और उनकी वीरता के लिए उन्हें वीर चक्र (Veer Chakra) से सम्मानित किया गया। उस समय वीर चक्र पाने वाले वो सबसे कम उम्र के अधिकारी थे।
मेजर आशाराम त्यागी (Major Asharam Tyagi) मौत को भी मात देने वाले वीर योद्धा थे, 1962 में खबर छपी की 1 लेफ्टिनेंट (Lieutenant) समेत 19 सैनिक (Soldiers) हुए लापता ! इनमे लापता लेफ्टिनेंट मेजर त्यागी (Major Asharam Tyagi) ही थे, हिमस्खलन (Landslide) के कारण वह 19 दिनों तक बर्फ में दबे रहे लेकिन फिर भी उन्होंने मौत को हरा दिया, यह देखकर डॉक्टर और अधिकारी हैरान थे।
मेजर आशाराम त्यागी (Major Asharam Tyagi) की युद्ध रणनीति और वीरता को देखते हुए भारतीय सेना ने उन्हें 1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध (India Pakistan War) में अग्रिम मोर्चे पर निर्देशित किया।
Battle of Dograi (Indo-Pak War) : 21 Sep 1965
21 सितंबर 1965 को, मेजर आसाराम त्यागी (Major Asharam Tyagi) ने व्यक्तिगत रूप से पाकिस्तान के डोगराई गांव में एक पाकिस्तानी post पर कब्जा करने के लिए भारतीय सेना (Indian Army) की एक कंपनी के अग्रणी दस्ते का नेतृत्व किया।
मेजर आसा राम त्यागी (Major Asharam Tyagi) के नेतृत्व में सेना का दस्ता, 21 सितंबर को डोगराई के पूर्वी किनारे पर कब्जा करने के लिए आगे बढ़ा,
उस इलाके में पहले से ही दुश्मन की फौज Tanks, recoil less gun और pillboxes के साथ अच्छी तरह से बचाव करने के लिए तैनात थी।
मेजर आशाराम त्यागी (Major Asharam Tyagi) ने दुश्मन की तैनाती और उनके पास उपलब्ध संसाधनों का आकलन करने के बाद अपनी फौज के Forward Squad के साथ आगे बढ़ने का फैसला किया।
दुश्मन के ठिकानों पर हमला करते हुए, मेजर आशाराम त्यागी को दाहिने कंधे में दो गोलियां लगीं। लेकिन वह अपने सैनिकों को गोली चलाने का निर्देश देते हुए आगे बढ़ते रहे। मेजर त्यागी ने महसूस किया कि दुश्मन के टैंक (Enemy Tanks) उनकी फौज के लिए सबसे बड़ा खतरा है और उन्हें बेअसर (Destroy) करने की जरूरत है।
अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की परवाह किए बिना, मेजर त्यागी ने दो टैंकों पर Grenade से हमला किया और उनके चालकों (Operators) को मौत के घाट उतार दिया जिससे दुश्मन के दो टैंकों पर कब्जा कर लिया गया और एक बड़ा खतरा खत्म हो गया।
इस दौरान मेजर आशाराम त्यागी (Major Asharam Tyagi) को तीन और गोलियां लगीं लेकिन जब तक वह बेहोश नहीं हो गए, तब तक वह अपने सैनिकों के साथ आगे बढ़ते रहे।
उनके सीने में 12 गोलियां धंसी हुई थी लेकिन फिर भी पूरे जोश के साथ हमला करते रहे। उन्होंने हर हर महादेव के जयकारे लगाते हुए दुश्मन के अधिकतर सैनिक मौत के घाट उतार डाले।
मेजर त्यागी ने साथ चल रहे मेजर शेखावत (Major Shekhawat) से कहा कि
" मैं बचूंगा नहीं, आप मुझे एक गोली मार दीजिए ,आपके हाथ से मर जाना चाहता हूँ लेकिन दुश्मन के हाथों कभी नही मरूँगा !"
हालांकि मेजर शेखावत ने उन पर गोली नही चलाई।
उनकी वीरता और अनुकरणीय नेतृत्व से प्रेरित होकर, उनके सैनिकों ने दोहरे जोश के साथ लड़ाई लड़ी और पोस्ट पर कब्जा करने में सफल रहे।
ज़ख्मी होने के कारण उन्हें अमृतसर के एक सैनिक अस्पताल में भर्ती करवाया गया, वहां मेजर त्यागी ने डॉक्टरों द्वारा अपनी मां को एक संदेश भिजवाया जिसमे उन्होंने कहा कि
मेरी माँ को बता देना की उसके बेटे ने पीठ पर नही सीने पर गोलियां खाई है ! , मेरा शव मेरे गाँव ले जाया जाए और माँ को जरूर दिखाना ताकि वो भी सीने पर लगी गोलियां देख सके !
मेजर आशाराम त्यागी 25 सितंबर 1965 को वीरगति को प्राप्त हुए और उनका बलिदान अमर हो गया।
मेजर आसाराम त्यागी को उनके अदम्य साहस, उत्कृष्ट नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए 'महावीर चक्र' (Mahavir Chakra) से सम्मानित किया गया।
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