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चीते की चाल, बाज की नज़र और बाजीराव की तलवार पर कभी सन्देह नही करते, भारत में मुग़ल सल्तनत को हमेशा के लिए समाप्त कर देने वाले अजेय योद्धा, 41 युद्धों में से एक भी न हारने वाले, सदैव अजेय रहने वाले, कलयुग ने परशुराम, जिनके शासन काल मे भारत के 90% भु-भाग पर हिंदुत्व स्वराज रहा हो, ऐसे महान योद्धा बाजीराव पेशवा प्रथम को शत शत नमन।

पेशवा बालाजी विश्वनाथ भट

Before Peshwas

After Peshwas

Shrimant Chima ji Appa
आज यह अत्यंत दुखद है कि भारतवर्ष ने ऐसे महान योद्धा को उचित श्रद्धांजलि नहीं दी, जिन्होंने न केवल हमारा सम्मान वापस जीता, बल्कि अधर्मियों को जड़ से समाप्त किया और हमारी संप्रभुता के रखरखाव के लिए जीवन भर संघर्ष किया। अगर हमारे पास ब्राह्मण पेशवा बाजीराव बल्लाल जैसे और भी योद्धा होते, तो शायद अंग्रेज भी कभी भारत पर अपनी नजरें जमाने की हिम्मत नहीं करते।
ऐसे गौरवशाली योद्धा की याद में, हर हर महादेव
पेशवा बाजीराव ..? क्या वही बाजीराव जिन्हें बुंदेलखंड के राजपूत राजा छत्रसाल की मुस्लिम बेटी से प्यार हो गया था, जैसा कि बाजीराव मस्तानी फ़िल्म में दर्शाया गया है? हां, लेकिन वामपंथियों की उस फिल्म में ब्राह्मण योद्धा, धर्मवीर पेशवा बाजीराव का मजाक उड़ाया गया और गलत तथ्य दिखाए गए। उस फिल्म में हमें एक ऐसे महान ब्राह्मण योद्धा का मजाक बनाते हुए दिखाया गया है जिसने अपना सम्पूर्ण जीवन धर्म को समर्पित किया।
श्रीमंत बाजीराव पेशवा प्रथम
चीते की चाल, बाज की नज़र और बाजीराव की तलवार पर कभी सन्देह नही करते, भारत में मुग़ल सल्तनत को हमेशा के लिए समाप्त कर देने वाले अजेय योद्धा, 41 युद्धों में से एक भी न हारने वाले, सदैव अजेय रहने वाले, कलयुग ने परशुराम, जिनके शासन काल मे भारत के 90% भु-भाग पर हिंदुत्व स्वराज रहा हो, ऐसे महान योद्धा बाजीराव पेशवा प्रथम को शत शत नमन।
संक्षिप्त परिचय
2 अप्रैल 1720 को बालाजी विश्वनाथ (प्रथम ब्राह्मण पेशवा) की मृत्यु ( सासवड, पुणे के पास ) एक संक्षिप्त बीमारी के कारण हुई, उनके दो बेटे थे, विसाजी जो बाद में बाजीराव के नाम से जाने गए और चिमनाजी (चिमाजी अप्पा) (निश्चित रूप से ईर्ष्यालु, असंवेदनशील दरबारी नहीं जैसा कि संजय लीला भंसाली की फिल्म में दिखाया गया है)ब्राह्मण योद्धा बाजीराव पेशवा के बारे में रोचक तथ्य :
- पेशवा बाजीराव को 12 साल की उम्र में उनके पिता बालाजी विश्वनाथ, (पहले पेशवा) ने युद्ध के मोर्चे पर निर्देशित किया था। बाजीराव प्रथम जल्द ही भारतीय इतिहास को बदलने वाले एक अद्वितीय और अपराजित योद्धा बन गए।

पेशवा बालाजी विश्वनाथ भट
- भट ब्राह्मण परिवार के नौ पेशवाओं में सबसे प्रभावशाली माने जाने वाले बाजीराव प्रथम ने अठारहवीं शताब्दी के मध्य में भारत का नक्शा ही बदल डाला और हिंदुत्व स्वराज पूरे भारत मे पुनः स्थापित किया।

Before Peshwas

After Peshwas
- मालवा (1723), धार (1724), औरंगाबाद (1724), पालखेड़ की लड़ाई (1728), फिरोजाबाद (1737), दिल्ली (1737), भोपाल (1738) और वसई की लड़ाई (1739) कुछ प्रमुख लड़ाइयाँ जिनमे बाजीराव प्रथम ने अद्वितीय विजय प्राप्त की।
- मुगल बादशाह, श्रीमन्त पेशवा बाजीराव बल्लाळ जी भट्ट से इतने भयभीत थे कि वो उनके साथ बैठक करने से भी डरते थे।
- पेशवा बाजीराव प्रथम को हिंदू धर्म के सर्वोच्च पराक्रमी योद्धाओं में गिना जाता है क्योंकि उन्होंने हिंदू धर्म को इस्लामी सम्राटों के आक्रमण से बचाया ही नही बल्कि इस्लाम की जड़ो पर प्रहार किया।
- वह भगवान शिव के प्रचंड भक्त थे।
- यह आमतौर पर, गलती से माना जाता है, कि महान नेपोलियन बोनापार्ट कभी युद्ध नहीं हारे। हालाँकि, यह सच नहीं है। नेपोलियन को अपने हिस्से का नुकसान हुआ था 'वाटरलू की लड़ाई' में। हालांकि, तथ्य यह है कि, एकमात्र योद्धा-पेशवा जो कभी एक भी लड़ाई नहीं हारे, अभूतपूर्व पेशवा बाजीराव बल्लाल जी भट्ट थे।
- ब्राह्मण पेशवा केवल बदला लेने का ही नहीं, बल्कि उन्होंने पूरे मुगल साम्राज्य को जड़ से मिटा देने का भी लक्ष्य रखा था जिसमे वें सफल भी हुए और मुगल साम्राज्य फिर कभी भी अस्तित्व में ना आ सका।
- अपने बहादुर भाई और साथी, चिमाजी अप्पा राव (निश्चित रूप से ईर्ष्यालु और असंवेदनशील दरबारी नहीं जैसा कि संजय लीला भंसाली की फिल्म में दिखाया गया है) के साथ, बाजीराव अपने शासन के एक दशक के भीतर लगभग पूरे भारतीय प्रायद्वीप को जीतने में कामयाब रहे।

Shrimant Chima ji Appa
- दिल्ली विजय के 3 महीनों के पश्चात पेशवा बाजीराव अपनी राजधानी पुणे लौट आए लेकिन मुगल राजकोष का एक बड़ा हिस्सा निकालने से बाद। जैसे ही मराठा शिविर लौट रहे थे, उन्हें मुगलों की एक संयुक्त सेना- निजाम की सेना और अवध के नवाब की सेना ने रोक लिया। निडर होकर बाजीराव ने दक्कन की रक्षा के लिए 10,000 सैनिकों के साथ चिमाजी राव अप्पा को वापस भेज दिया, जबकि उन्होंने स्वयं 80,000 सैनिकों के साथ दिल्ली की ओर कूच किया। क्रिसमस की पूर्व संध्या 1737 (१७३७) को भोपाल में दो खेमे आपस में भिड़ गए, जहां पेशवाई सेना ने मुगल साम्राज्य के तहत संयुक्त बलों को व्यापक रूप से खदेड़ दिया। निज़ाम को इस बार दोराहा में एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया गया, जिसमें मालवा के स्वामित्व को मराठों को हस्तांतरित किया गया और मुआवजे के रूप में 50 लाख रुपये का भुगतान किया गया। इस संधि पर निज़ाम को कुरान का पालन करने के लिए मजबूर किया गया था। यह एक ऐसी जीत थी जिसने नादिर शाह के अंतिम आक्रमण से पहले न केवल मुगल साम्राज्य को कमजोर किया, बल्कि भारतीय प्रायद्वीप पर पेशवा बाजीराव की सर्वोच्चता भी स्थापित की।
- मराठा की स्थापना भले ही छत्रपति शिवाजी महाराज ने की, लेकिन उसे साम्राज्य के रूप में पेशवा बाजीराव ने विस्तृत किया, मराठा का अस्तित्व पेशवा के बिना अधूरा था।
- राजपुताना के अधिक्तर राजा बस अपने राज्य के बचाव में लगे रहे, वो संधियों में बंधे रहे, लेकिन कहते है ना कि संधि मनुष्य को गुलाम बना देती है, वीर अपने बल के दम पर शांति स्थापित करते है। इसके विपरित सभी ब्राह्मण पेशवा योद्धा रक्षा के साथ साथ दुश्मन की जड़ो पर अत्यंत आक्रामकता एवं युद्ध कौशल के साथ प्रहार करते थे, जिससे दुश्मन सदा के लिए समाप्त हो जाता था।
आज यह अत्यंत दुखद है कि भारतवर्ष ने ऐसे महान योद्धा को उचित श्रद्धांजलि नहीं दी, जिन्होंने न केवल हमारा सम्मान वापस जीता, बल्कि अधर्मियों को जड़ से समाप्त किया और हमारी संप्रभुता के रखरखाव के लिए जीवन भर संघर्ष किया। अगर हमारे पास ब्राह्मण पेशवा बाजीराव बल्लाल जैसे और भी योद्धा होते, तो शायद अंग्रेज भी कभी भारत पर अपनी नजरें जमाने की हिम्मत नहीं करते।
ऐसे गौरवशाली योद्धा की याद में, हर हर महादेव
