Pandit Radhanath Sikdar
क्या आपको पता है कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई किसने नापी थी ? Normally सब यही सोचेंगे कि इतना बड़ा काम करने वाला कोई विदेशी ही होगा।
लेकिन हकीकत तो यह है की माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई नापने वाले सबसे पहले व्यक्ति पंडित राधानाथ सिकदर थे जो एक भारतीय थे।
यह बात है 1831 की, 1831 में अंग्रेज सरकार ने पूरे भारत के सटीक सर्वेक्षण के लिए the great trigonometric survey चलाया था जिसकी जिम्मेदारी जॉर्ज एवरेस्ट को दी गयी थी जो तबका surveyor general of india था। george everest को अपनी सहायता के लिए एक ऐसे गणितज्ञ की तलाश थी जिसने spherical trigonometry में महारत हासिल की हो। तब बंगाल के हिन्दू कॉलेज में पढ़ रहे 19 साल के राधानाथ सिकदर को everest ने 30₹month के वेतन पर "कंप्यूटर" के पद पर नियुक्त किया। उस समय computing का काम इंसान ही करते थे।
एवरेस्ट के रिटायर होने के बाद एंड्रयू स्कॉट वॉ को surveyor general of india बनाया गया, उसने 1852 में सिकदर को पहाड़ों की ऊंचाई नापना शुरू करने के लिए कहा । सिकदर ने बिना किसी आधुनिक टेक्निक और उपकरण के सिर्फ एक टेलिस्कोप theodolite की मदद से भारत के छह अलग-अलग हिस्सों में peak xv का अध्ययन कर उसकी जानकारी प्राप्त की और 4 साल की कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी का पता लगाया और कहा कि यह कंचनजंघा से भी ज़्यादा ऊंचा है, जिसे तब तक दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी माना जाता था।
सिकदर ने इसकी ऊंचाई की गणना ठीक 29, 000 फीट की थी, लेकिन andrew स्कोट वॉ ने इसे और अधिक विश्वसनीय आंकड़ा दिखाने के लिए इसमें 2 फीट और जोड़ा। आधिकारिक ऊंचाई की घोषणा 1856 में 29,002 फीट के रूप में की गई और andrew स्कोट वॉ ने पर्वत का नाम भी अपने गुरु जॉर्ज एवेरेस्ट के नाम पर रख दिया।
अंग्रेजों ने सफलता का श्रेय पंडित राधानाथ सिकदर जी को कभी नही दिया।
एक सदी बाद, 1955 में, एक भारतीय सर्वेक्षण ने 29,029 फीट की ऊंचाई की घोषणा की।
यह दुर्भाग्य की बात की है आज भी आज़ाद भारत उस चोटी को अंग्रेज़ो के नाम से जानता है, और आज भी हम अपनी गौरवशाली प्रतिभाओं का उचित सम्मान नही कर पा रहे है।
इस Article को ज्यादा से ज्यादा भारतियों को शेयर करे जिससे वो भी सच्चाई जान सके!
लेकिन हकीकत तो यह है की माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई नापने वाले सबसे पहले व्यक्ति पंडित राधानाथ सिकदर थे जो एक भारतीय थे।
यह बात है 1831 की, 1831 में अंग्रेज सरकार ने पूरे भारत के सटीक सर्वेक्षण के लिए the great trigonometric survey चलाया था जिसकी जिम्मेदारी जॉर्ज एवरेस्ट को दी गयी थी जो तबका surveyor general of india था। george everest को अपनी सहायता के लिए एक ऐसे गणितज्ञ की तलाश थी जिसने spherical trigonometry में महारत हासिल की हो। तब बंगाल के हिन्दू कॉलेज में पढ़ रहे 19 साल के राधानाथ सिकदर को everest ने 30₹month के वेतन पर "कंप्यूटर" के पद पर नियुक्त किया। उस समय computing का काम इंसान ही करते थे।
एवरेस्ट के रिटायर होने के बाद एंड्रयू स्कॉट वॉ को surveyor general of india बनाया गया, उसने 1852 में सिकदर को पहाड़ों की ऊंचाई नापना शुरू करने के लिए कहा । सिकदर ने बिना किसी आधुनिक टेक्निक और उपकरण के सिर्फ एक टेलिस्कोप theodolite की मदद से भारत के छह अलग-अलग हिस्सों में peak xv का अध्ययन कर उसकी जानकारी प्राप्त की और 4 साल की कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी का पता लगाया और कहा कि यह कंचनजंघा से भी ज़्यादा ऊंचा है, जिसे तब तक दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी माना जाता था।
सिकदर ने इसकी ऊंचाई की गणना ठीक 29, 000 फीट की थी, लेकिन andrew स्कोट वॉ ने इसे और अधिक विश्वसनीय आंकड़ा दिखाने के लिए इसमें 2 फीट और जोड़ा। आधिकारिक ऊंचाई की घोषणा 1856 में 29,002 फीट के रूप में की गई और andrew स्कोट वॉ ने पर्वत का नाम भी अपने गुरु जॉर्ज एवेरेस्ट के नाम पर रख दिया।
अंग्रेजों ने सफलता का श्रेय पंडित राधानाथ सिकदर जी को कभी नही दिया।
एक सदी बाद, 1955 में, एक भारतीय सर्वेक्षण ने 29,029 फीट की ऊंचाई की घोषणा की।
यह दुर्भाग्य की बात की है आज भी आज़ाद भारत उस चोटी को अंग्रेज़ो के नाम से जानता है, और आज भी हम अपनी गौरवशाली प्रतिभाओं का उचित सम्मान नही कर पा रहे है।
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