मेरे सीने में नही तो तेरे सीने में सही लेकिन आग जलनी चाहिए - अमर ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार त्यागी

 दुष्यंत कुमार त्यागी (दुष्यंत कुमार)

1931 - 1975



सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नही

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।।


आज वीरान अपना घर देखा, तो कई बार झाँक कर देखा

पाँव टूटे हुए नज़र आये, एक ठहरा हुआ खंडहर देखा।।


छोटी सी उम्र में जिसने अपनी कलम से व्यवस्थाओं पर आग ऊगली हो। नौजवान कवि/ग़ज़लकार का ये गुस्सा और नाराज़गी अन्याय, अव्यवस्थाओं और राजनीतिक कुकर्मों के ख़िलाफ़ था।


जब स्व० श्री मती गाँधी (पू०प्रधानमंत्री) के दरबार हाँ-हुज़ूरों से सजे थे तब बिजनोर (उ० प्र०) की हिंदी पट्टी का एक नौजवान उर्दू और हिंदी में सामंजस्य बनाते हुए, अहंकार में चूर सत्ता के विमुख अपनी ग़ज़लों/गीतों से लोगो मे अपने गुस्से का इज़हार करता है।


उस समय के दो बड़े शायरों ( कैफ़ भोपाली और ताज़ भोपाली) का ग़ज़ल की दुनिया पे राज था, ऐसे में ग़ज़ल को जनचेतना की दिशा देना अपने आप मे बड़ा काम था।


मै बात कर रहा हूँ, बिजनौर में जन्मे निराले शायर / ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार त्यागी जिन्हें हम दुष्यंत कुमार के नाम से जानते है। निम्न मध्यम वर्ग से आये इस नौजवान शायर ने उम्र भर सत्ता के गलियारों में पिछड़ो और गरीबों के लिए ग़ज़लों की मशाल

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