महर्षि शुश्रुत
जन्म : 600 ई. पूर्व।
जन्म स्थान ; काशी
महर्षि शुश्रुत भारत के महान चिकित्सा शास्त्री एवं शल्यचिकित्सक थे। महर्षि शुश्रुत को सर्जरी और प्लास्टिक ( रयनोप्लास्टिक) सर्जरी का पितामह कहा जाता है। ✅
आचार्य सुश्रुत शल्य चिकित्सा (सर्जरी) के जनक :-
शल्य चिकित्सा (सर्जरी) के पितामह और सुश्रुतसंहिता के प्रणेता आचार्य सुश्रुत का जन्म छठी शताब्दी ईसा पूर्व काशी में हुआ था। सुश्रुत का जन्म विश्वामित्र के वंश में हुआ था। इन्होंने धन्वन्तरि से शिक्षा प्राप्त की थी।
सुश्रुतसंहिता को भारतीय चिकित्सा पद्धति में विशेष स्थान प्राप्त है।
इसमें शल्य चिकित्सा के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से समझाया गया है। शल्य क्रिया के लिए सुश्रुत 125 तरह के उपकरणों का प्रयोग करते थे। ये उपकरण शल्य क्रिया की जटिलता को देखते हुए खोजे गए थे। इन उपकरणों में विशेष प्रकार के चाकू, सुइयां, चिमटियां आदि हैं। सुश्रुत ने 300 प्रकार की ऑपरेशन प्रक्रियाओं की खोज की।
आठवीं शताब्दी में सुश्रुतसंहिता का अरबी अनुवाद किताब-इ-सुश्रुत के रूप में हुआ। सुश्रुत ने कॉस्मेटिक सर्जरी में विशेष निपुणता हासिल कर ली थी।
एक बार आधी रात के समय सुश्रुत को दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी। उन्होंने दीपक हाथ में लिया और दरवाजा खोला। दरवाजा खोलते ही उनकी नजर एक व्यक्ति पर पड़ी। उस व्यक्ति की आंखों से अश्रु-धारा बह रही थी और नाक कटी हुई थी। उसकी नाक से तीव्र रक्त-स्राव हो रहा था। व्यक्ति ने आचार्य सुश्रुत से सहायता के लिए विनती की। सुश्रुत ने उसे अन्दर आने के लिए कहा। उन्होंने उसे शांत रहने को कहा और दिलासा दिया कि सब ठीक हो जायेगा। वे अजनबी व्यक्ति को एक साफ और स्वच्छ कमरे में ले गए। कमरे की दीवार पर शल्य क्रिया के लिए आवश्यक उपकरण टंगे थे।
उन्होंने अजनबी के चेहरे को औषधीय रस से धोया और उसे एक आसन पर बैठाया। उसको एक गिलास में शोमरस भरकर सेवन करने को कहा और स्वयं शल्य क्रिया की तैयारी में लग गए। उन्होंने एक पत्ते द्वारा जख्मी व्यक्ति की नाक का नाप लिया और दीवार से एक चाकू व चिमटी उतारी। चाकू और चिमटी की मदद से व्यक्ति के गाल से एक मांस का टुकड़ा काटकर उसे उसकी नाक पर प्रत्यारोपित कर दिया। इस क्रिया में व्यक्ति को हुए दर्द का शौमरस ने महसूस नहीं होने दिया। इसके बाद उन्होंने नाक पर टांके लगाकर औषधियों का लेप कर दिया। व्यक्ति को नियमित रूप से औषाधियां लेने का निर्देश देकर सुश्रुत ने उसे घर जाने के लिए कहा।
सुश्रुत नेत्र शल्य चिकित्सा भी करते थे।
सुश्रुतसंहिता में मोतियाबिंद के ऑपरेशन करने की विधि को विस्तार से बताया है। उन्हें शल्य क्रिया द्वारा प्रसव कराने का भी ज्ञान था। सुश्रुत को टूटी हुई हड्डी का पता लगाने और उनको जोड़ने में विशेषज्ञता प्राप्त थी। शल्य क्रिया के दौरान होने वाले दर्द को कम करने के लिए वे मद्यपान या विशेष औषधियां देते थे। सुश्रुत श्रेष्ठ शल्य चिकित्सक होने के साथ-साथ श्रेष्ठ शिक्षक भी थे।
उन्होंने अपने शिष्यों को शल्य चिकित्सा के सिद्धांत बताये और शल्य क्रिया का अभ्यास कराया। प्रारंभिक अवस्था में शल्य क्रिया के अभ्यास के लिए फलों, सब्जियों और मोम के पुतलों का उपयोग करते थे। मानव शरीर की अंदरूनी रचना को समझाने के लिए सुश्रुत शव के ऊपर शल्य क्रिया करके अपने शिष्यों को समझाते थे। सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा में अद्भुत कौशल अर्जित किया तथा इसका ज्ञान अन्य लोगों को कराया।
उन्होंने शल्य चिकित्सा के साथ-साथ आयुर्वेद के अन्य पक्षों जैसे शरीर संरचना, काया-चिकित्सा, बाल रोग, स्त्री रोग, मनोरोग आदि की जानकारी भी दी। कई लोग प्लास्टिक सर्जरी को अपेक्षाकृत एक नई विधा के रूप में मानते हैं।
प्लास्टिक सर्जरी की उत्पत्ति की जड़ें भारत की सिंधु नदी सभ्यता से 4000 से अधिक साल से जुड़ी हैं। इस सभ्यता से जुड़े श्लोकों को 3000 और 1000 ई.पू. के बीच संस्कृत भाषा में वेदों के रूप में संकलित किया गया है, जो हिन्दू धर्म की सबसे पुरानी पवित्र पुस्तकों में में से हैं।
इस युग को भारतीय इतिहास में वैदिक काल के रूप में जाना जाता है, जिस अवधि के दौरान चारों वेदों अर्थात् ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद को संकलित किया गया। चारों वेद श्लोक, छंद, मंत्र के रूप में संस्कृत भाषा में संकलित किए गए हैं और सुश्रुत संहिता को अथर्ववेद का एक हिस्सा माना जाता है।
सुश्रुत संहिता, जो भारतीय चिकित्सा में सर्जरी की प्राचीन परंपरा का वर्णन करता है, उसे भारतीय चिकित्सा साहित्य के सबसे शानदार रत्नों में से एक के रूप में माना जाता है। इस ग्रंथ में महान प्राचीन सर्जन सुश्रुत की शिक्षाओं और अभ्यास का विस्तृत विवरण है, जो आज भी महत्वपूर्ण व प्रासंगिक शल्य चिकित्सा ज्ञान है।
प्लास्टिक सर्जरी का मतलब है- शरीर के किसी हिस्से की रचना ठीक करना। प्लास्टिक सर्जरी में प्लास्टिक का उपयोग नहीं होता है।
सर्जरी के पहले जुड़ा प्लास्टिक ग्रीक शब्द प्लास्टिको से आया है। ग्रीक में प्लास्टिको का अर्थ होता है बनाना, रोपना या तैयार करना। प्लास्टिक सर्जरी में सर्जन शरीर के किसी हिस्से के उत्तकों को लेकर दूसरे हिस्से में जोड़ता है।
भारत में सुश्रुत को पहला सर्जन माना जाता है|
✍️महर्षि शुश्रुत ने 2500 साल पहले विश्व को सर्जरी का ज्ञान दिए थे। महर्षि शुश्रुत के वक्त आज की जैसी प्रयोगशालाएं न थी,न यंत्र थे। महर्षि शुश्रुत ने ज्ञान और अनुभव के बिनाह में चिकित्सक क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है,जिसकी नींव में आज की चिकित्सक विज्ञान टिकी है।
✍️ महर्षि शुश्रुत विश्व के पहले चिकित्सक थे जिन्होंने शल्य चिकित्सा ( Caesarean operation) का प्रचार किया। महर्षि शुश्रुर शल्य क्रिया के अलावा टूटी हड्डियों को जोड़ने में ,मूत्र नलिका से पथरी निकलना, शल्य पद्दति के द्वारा प्रसव कराने एवं मोतिया बिंद के शल्य - चिकित्सा में दक्ष थे।महर्षि शुश्रुत रोगी को शल्य क्रिया से पहले विशेष प्रकार की औषधि( anesthesia) देते थे । जिससे शल्य क्रिया के दौरान रोगी को दर्द न हो।
✍️ महर्षि शुश्रुत टूटी हुई हड्डी को देखकर उसकी सही स्थिति का अंदाजा लगा लेते थे। और ऑपरेशन के द्वारा उसे शानदार ढंग से जोड़ भी देते थे। कटी हुई नाक को जोड़ना, कटे हुए हाँथ को जोड़ना ,नाड़ी ( नस) में घाव ढूंढकर उसे ठीक करना , शरीर से हानिकारक द्रव्य ( मवाद) निकलना इत्यदि महर्षि शुश्रुत करते थे।
✍️ महर्षि शुश्रुत हड्डी टूटने पर उसे जोड़ने के लिए बांस की पट्टियों का प्रयोग करते थे। हड्डी को ठीक से बैठाने के लिए बाहर से मालिश करते थे। सर एवं चेहरा जब फट जाता था तो उसमे बंध( टांका) लगाते थे। अगर शरीर मे कोई लोहा घुस जाता था तो उसको निकलने के लिए चुम्बक का प्रयोग करते थे। अगर शरीर मे फोड़ा हो गया हो तो सेकाई करकर य चीरा लगाकर उसको ठीक करते थे।
✍️ महर्षि शुश्रुत ने चिकित्सा संबंधी कई दिशा निर्देश दिए हैं। जैसे वैद्य ( डॉक्टर) रोगी को अपने पुत्र समान समझे और उसकी सेवा करे , शाल्य क्रिया से पहले औजारों को गरम कर देना क्योंकि एक ही औजार से कई रोगीयों की शल्य क्रिया होती थी। जिससे रोगी के शरीर को किसी भी प्रकार का इन्फेक्शन न हो इत्यदि
✍️ महर्षि शुश्रुत हम हिंदुओ के परंपराप्राप्त आचार्य थे। धनवंतरि जी से महर्षि शुश्रुत को शल्य चिकित्सा का ज्ञान प्राप्त हुआ था। बाद में आचार्य चरक महर्षि शुश्रुत के उत्तराधिकारी बने थे। पितामह ब्रम्हा जी से ये ज्ञान अश्विनी कुमारों को मिला था। अश्विनी कुमार से ये ज्ञान देवराज इंद्र को प्राप्त हुआ था। बाद में इस विद्या की दो शाखाएं हो गई जो काय - चिकित्सा और शल्य चिकित्सा के नाम से जानी जाती है। काय चिकित्सा में भारद्वाज मुनि,आत्रेय, अग्निवेश जैसे आचार्य प्रमुखता से आते हैं। जबकि सुश्रुत सहिंता में देवराज इंद्र,धनवंतरि जी प्रमुखता से आते हैं।
✍️ 184 अध्याय वाली शुश्रुत संहिता में आठ तरीके की सर्जरी और 1120 प्रकार के रोगों के बारे में बताया गया है। ये है हमारे भारतीय ऋषियों की योग्यता और ज्ञान जिसके दम में विदेशियों ने उन्नति प्राप्त की और हम हैं जो अपने मान्यचार्यो के दिशानिर्देशन में चलते नही हैं।
✍️ ऑस्ट्रेलिया के रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन और अमेरिका के कोलंबिया यूनिवर्सिटी इरविंग मेडिकल सेंटर में दुनिया के पहले प्लास्टिक सर्जन महर्षि शुश्रुत की मूर्ति लगी है।
जय सनातन धर्म 🙏🙏
