पंडित कांशीराम जी ग़दर पार्टी के प्रमुख नेता और देश की स्वाधीनता के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले पहले गदर नेता थे।
AMAR BALIDAANI PANDIT KANSHIRAM JI
पंडित जी का जन्म 11 जुलाई 1883 ई. में पंजाब के अंबाला ज़िले में हुआ था। मैट्रिक पास करने के बाद उन्होंने तार भेजने प्राप्त करने का काम सीखा और कुछ दिन अंबाला और दिल्ली में नौकरी की। इसके बाद वे अमेरिका चले गए। यहीं से उनका क्रांतिकारी जीवन आरंभ हुआ । आजीविका के लिए पंडित कांशीराम ने ठेकेदारी का काम किया। साथ ही वे इंडियन_एसोसिएशन_ऑफ_अमेरिका और इंडियन_इंडिपैंडेंट_लीग में शामिल हो गए। उनके ऊपर *लाला हरदयाल* का बहुत प्रभाव पड़ा। वे संगठन भारत को अंग्रेजों की चुंगल से छुड़ाने के लिए बनाए गए थे । ये वही संघठन है जिनको गाँधी और आजकल के लिबरल लोगो ने आतंकवादियों का गिरोह बोला था/है , गाँधी के इस कृत्य ने समूचे शहीदों के बलिदान का अपमान किया था | 1913 में पंडित कांशीराम *ग़दर पार्टी* के कोषाध्यक्ष बन गए।
जिस समय यूरोप में प्रथम विश्वयुद्ध के बादल मंडरा रहे थे, ग़दर पार्टी ने निश्चय किया कि कुछ लोगों को अमेरिका से भारत वापस जाना चाहिए। वे वहां जाकर भारतीय सेना में अंग्रेजों के विरुद्ध भावनाएँ भड़काएँ। इसी योजना के अंतर्गत पंडित कांशीराम भी भारत आए।
उन्होंने सेना की कई छावनियों की यात्रा की और सैनिकों को अंग्रेजों की सत्ता उखाड़ फेंकने के लिए प्रेरित किया। कांशीराम और उनके साथियों ने अपने कार्य के लिए धन जुटाने के उद्देश्य से मोगा का सरकारी कोषागार लूटने का असफल प्रयत्न भी किया। इसी सिलसिले में एक सव-इंस्पेक्टर और एक जिलेदार इनकी गोलियों से मारे गए।
कांशीराम और उनके साथी पकड़े गए, मुकदमा चला और इस पार्टी के 11 शहीदों में, रूपनगर जिले के, गांव मड़ौली कलां के निवासी, पंडित कांशीराम जी को 27 मार्च 1915 को लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी पर लटका दिया गया ।
गदर लहर के पहले शहीद #पंडित_कांशीराम जी की शहादत को देश भुला चुका है।
वह हमेशा कहते थे :-----
जिस समय यूरोप में प्रथम विश्वयुद्ध के बादल मंडरा रहे थे, ग़दर पार्टी ने निश्चय किया कि कुछ लोगों को अमेरिका से भारत वापस जाना चाहिए। वे वहां जाकर भारतीय सेना में अंग्रेजों के विरुद्ध भावनाएँ भड़काएँ। इसी योजना के अंतर्गत पंडित कांशीराम भी भारत आए।
उन्होंने सेना की कई छावनियों की यात्रा की और सैनिकों को अंग्रेजों की सत्ता उखाड़ फेंकने के लिए प्रेरित किया। कांशीराम और उनके साथियों ने अपने कार्य के लिए धन जुटाने के उद्देश्य से मोगा का सरकारी कोषागार लूटने का असफल प्रयत्न भी किया। इसी सिलसिले में एक सव-इंस्पेक्टर और एक जिलेदार इनकी गोलियों से मारे गए।
कांशीराम और उनके साथी पकड़े गए, मुकदमा चला और इस पार्टी के 11 शहीदों में, रूपनगर जिले के, गांव मड़ौली कलां के निवासी, पंडित कांशीराम जी को 27 मार्च 1915 को लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी पर लटका दिया गया ।
गदर लहर के पहले शहीद #पंडित_कांशीराम जी की शहादत को देश भुला चुका है।
वह हमेशा कहते थे :-----
"मैं कुण , कुण घराना मेरा,
सारा हिंदोस्तान ए मेरा।
भारत मां है मेरी माता,
ओ जंजीरा जकड़ी ए।
ओ अंग्रेजां पकड़ी ए,
उसनू आजाद कराना ए"........
पर शायद आजादी को लेकर उनकी इन कविताओं के मायने भी अब लोगों के लिए नहीं रह गए हैं....?
आजादी के परवाने एवं देश के पहाड़ी_गांधी_बाबा कांशीराम जी अब स्मृतियों में ही रह गए हैं.....
सहृदय कोटि-कोटि नमन है पंडित_कांशीराम जी को
वन्देमातरम
gadar party
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